पद्य- 2
पद-त्रय
बोध एवं विचार (अभ्यास के उत्तर)
1. 'हाँ' या 'नहीं' में उत्तर दो:
(क) हिंदी की कृष्ण-भक्ति काव्य-धारा में कवयित्री मीराँबाई का स्थान सर्वोपरि है।
उत्तर: नहीं (पाठ के अनुसार, महाकवि सूरदास जी के बाद उनका स्थान है) ।
(ख) कवयित्री मीराँबाई भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य आराधिका थीं।
उत्तर: हाँ ।
(ग) राजपूतों की तत्कालीन परंपरा का विरोध करते हुए क्रांतिकारी मीराँ सती नहीं हुईं।
उत्तर: हाँ ।
(घ) मीराँबाई अपने को श्री कृष्ण जी के चरण-कमलों में पूरी तरह समर्पित नहीं कर पायी थीं।
उत्तर: नहीं (वे स्वयं को पूरी तरह समर्पित और न्योछावर कर चुकी थीं) ।
(ङ) मीराँबाई ने सुंदर श्याम जी को अपने घर आने का आमंत्रण दिया है।
उत्तर: हाँ ।
2. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो:
(क) कवयित्री मीराँबाई का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: कवयित्री मीराँबाई का जन्म प्राचीन राजपूताने के अंतर्गत 'मेड़ता' प्रांत के 'कुड़की' नामक स्थान में राठौड़ वंश की मेड़तिया शाखा में हुआ था ।
(ख) भक्त-कवयित्री मीराँबाई को कौन-सी आख्या मिली है?
उत्तर: अपने आराध्य के प्रति एकनिष्ठ प्रेम-भक्ति के कारण मीराँबाई को 'कृष्ण प्रेम-दीवानी' की आख्या मिली है ।
(ग) मीराँबाई के कृष्ण भक्तिपरक फुटकल पद किस नाम से प्रसिद्ध हैं?
उत्तर: मीराँबाई के कृष्ण भक्तिपरक फुटकल पद 'मीराँबाई की पदावली' के नाम से प्रसिद्ध हैं ।
(घ) मीराँबाई के पिता कौन थे?
उत्तर: मीराँबाई के पिता राव रत्न सिंह थे ।
(ङ) कवयित्री मीराँबाई ने मनुष्यों से किस नाम का रस पीने का आह्वान किया है?
उत्तर: कवयित्री मीराँबाई ने मनुष्यों से 'राम नाम' (कृष्ण नाम) का रस पीने का आह्वान किया है ।
3. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में) :
(क) मीराँ-भजनों की लोकप्रियता पर प्रकाश डालो।
उत्तर: भारतीय जन-साधारण के बीच कबीरदास, सूरदास और तुलसीदास के भजनों की तरह ही मीराँ-भजन भी समान रूप से लोकप्रिय और प्रिय रहे हैं । इनके गीत-पद हिंदी और भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि माने जाते हैं ।
(ख) मीराँबाई का बचपन किस प्रकार बीता था?
उत्तर: बचपन में माता के निधन और पिता के युद्धों में व्यस्त रहने के कारण मीराँ का पालन-पोषण उनके दादा राव दूदाजी की देखरेख में हुआ । कृष्ण-भक्त दादा के साथ रहते हुए उनके हृदय में भक्ति के बीज अंकुरित हुए ।
(ग) मीराँबाई का देहावसान किस प्रकार हुआ था?
उत्तर: मीराँबाई अपने जीवन के अंतिम समय में द्वारकाधाम पहुँची थीं । ऐसी मान्यता है कि सन् 1546 के आसपास रणछोड़ जी के मंदिर में भजन-कीर्तन करते हुए वे भगवान की मूर्ति में सदा के लिए विलीन हो गयीं ।
(घ) कवयित्री मीराँबाई की काव्य भाषा पर प्रकाश डालो।
उत्तर: मीराँबाई ने मुख्य रूप से हिंदी की उपभाषा राजस्थानी में काव्य रचना की है । हालाँकि, उनकी भाषा में ब्रज, खड़ी बोली, पंजाबी और गुजराती आदि भाषाओं के शब्दों का सुंदर मिश्रण भी देखने को मिलता है ।
4. संक्षेप में उत्तर (लगभग 50 शब्दों में):
(क) प्रभु कृष्ण के चरण-कमलों पर अपने को न्योछावर करने वाली मीराँबाई ने अपने आराध्य से क्या-क्या निवेदन किया है?
उत्तर:प्रथम पद में मीराँबाई कहती हैं कि वे पूरी तरह से गोपाल जी के श्री चरणों की शरण में आ गई हैं । वे प्रभु से निवेदन करती हैं कि अब जबकि पूरे संसार को उनकी इस भक्ति का पता चल गया है, तो प्रभु उन पर अपनी विशेष कृपा करें । वे अपने आराध्य से उन्हें दर्शन देने और शीघ्र ही उनकी सुध (खबर) लेने की विनती करती हैं । मीराँ स्वयं को प्रभु के चरण-कमलों पर पूरी तरह न्योछावर कर चुकी हैं ।
(ख) सुंदर श्याम को अपने घर आने का आमंत्रण देते हुए कवयित्री ने उनसे क्या-क्या कहा है?
उत्तर:द्वितीय पद में मीराँबाई अपने जीवनाधार सुंदर श्याम को घर आने का निमंत्रण देते हुए कहती हैं कि उनके विरह में वे पके हुए पत्ते (पाण) की तरह पीली पड़ गई हैं । प्रभु के आए बिना वे अपनी सुध-बुध खो बैठी हैं और उनका ध्यान केवल प्रभु पर ही लगा है । वे कहती हैं कि उन्हें किसी अन्य से कोई आशा नहीं है, इसलिए प्रभु शीघ्र आकर उनसे मिलें और उनके मान-सम्मान की रक्षा करें ।
(ग) मनुष्य मात्र से राम (कृष्ण) नाम का रस पीने का आह्वान करते हुए मीराँबाई ने उन्हें कौन-सा उपदेश दिया है?
उत्तर:तृतीय पद में मीराँबाई मनुष्यों को उपदेश देती हैं कि वे कुसंगति को त्यागकर सत्संग में बैठें और नित्य हरि चर्चा का आनंद लें । वे मनुष्य को अपने चित्त से काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह जैसे विकारों को निकाल फेंकने का परामर्श देती हैं । उनका मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को राम नाम के रस का पान करना चाहिए और प्रभु कृष्ण के प्रेम-रंग-रस में पूरी तरह सराबोर हो जाना चाहिए ।
5. सम्यक् उत्तर दो (लगभग 100 शब्दों में) :
(क) मीराँबाई के जीवन वृत्त पर प्रकाश डालो।
उत्तर:कृष्ण-भक्ति काव्य धारा की प्रमुख कवयित्री मीराँबाई का जन्म सन् 1498 के आसपास राजस्थान के मेड़ता प्रांत के 'कुड़की' नामक गाँव में राठौड़ वंश में हुआ था । बचपन में ही माता का निधन हो जाने के कारण उनका पालन-पोषण उनके दादा राव दूदाजी की देखरेख में हुआ, जो स्वयं एक परम कृष्ण-भक्त थे । इसी परिवेश के कारण मीराँ के मन में बचपन से ही कृष्ण-भक्ति के बीज अंकुरित हुए । सन् 1516 में उनका विवाह मेवाड़ के कुँवर भोजराज के साथ हुआ, किंतु दुर्भाग्यवश विवाह के सात वर्ष बाद ही उनके पति का स्वर्गवास हो गया । इसके पश्चात उन्होंने सती होने की तत्कालीन परंपरा को त्याग दिया और अपना पूरा जीवन कृष्ण की भक्ति और साधु-संगति में समर्पित कर दिया । अंत में, वे द्वारका चली गईं और सन् 1546 के आसपास रणछोड़ जी की मूर्ति में विलीन हो गईं ।
(ख) पठित पदों के आधार पर मीराँबाई की भक्ति भावना का निरूपण करो।
उत्तर:मीराँबाई की भक्ति 'कांता भाव' और पूर्ण समर्पण की पराकाष्ठा है। पठित पदों के आधार पर, उनकी भक्ति में अपने आराध्य के प्रति अटूट विश्वास और एकनिष्ठ प्रेम दिखाई देता है। प्रथम पद में वे स्वयं को 'चरण लगी' बताकर पूर्ण आत्म-समर्पण करती हैं और प्रभु से शीघ्र दर्शन देने की विनती करती हैं । दूसरे पद में उनकी भक्ति विरह-वेदना के रूप में प्रकट होती है, जहाँ वे कृष्ण को अपना 'जीवनाधार' मानकर उनके दर्शन हेतु व्याकुल हैं और अपने मान की रक्षा की पुकार करती हैं । तीसरे पद में उनकी भक्ति का उपदेशात्मक रूप दिखता है, जहाँ वे सांसारिक मोह-माया, क्रोध और लोभ को त्यागकर केवल 'राम नाम' के रस में डूबने का आह्वान करती हैं । उनकी भक्ति में लोक-लाज का भय नहीं, बल्कि केवल प्रभु गिरिधर नागर के प्रति अनन्य प्रेम है ।
(ग) कवयित्री मीराँबाई का साहित्यिक परिचय प्रस्तुत करो।
उत्तर:साहित्यिक दृष्टि से मीराँबाई का स्थान हिंदी की कृष्ण-भक्ति शाखा में महाकवि सूरदास के बाद अत्यंत महत्वपूर्ण है । उनकी रचनाएँ 'मीराँबाई की पदावली' के नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनमें लगभग दो सौ फुटकर पद संकलित हैं । मीराँ की काव्य भाषा मुख्य रूप से राजस्थानी है, परंतु उसमें ब्रज, खड़ी बोली, पंजाबी और गुजराती भाषा के शब्दों का सुंदर मिश्रण मिलता है । उनकी काव्य शैली की प्रमुख विशेषता सहज अभिव्यक्ति, कोमल शब्दावली और संगीतात्मकता है । उनके पदों में भक्ति-भावना और काव्यत्व का एक अनूठा संतुलन मिलता है, जो उन्हें भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि बनाता है । सहज लय और माधुर्य के कारण उनके पद आज भी जन-साधारण के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कबीर और तुलसी के भजन ।
6. सप्रसंग व्याख्या करो :
(क) "मैं तो चरण लगी...............चरण-कमल बलिहार।"
उत्तर: प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'आलोक भाग-2' के 'पद-त्रय' शीर्षक से ली गई हैं, जिसकी रचयिता कवयित्री मीराँबाई हैं I
व्याख्या: इन पंक्तियों में मीराँबाई अपने आराध्य श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त कर रही हैं I वे कहती हैं कि मैं प्रभु गोपाल के चरणों की शरण में आ गई हूँ I पहले मेरी इस भक्ति के बारे में कोई नहीं जानता था, किंतु अब सारा संसार इस बात को जान चुका है I मीराँ अपने प्रभु से विनती करती हैं कि वे उन पर कृपा करें, उन्हें दर्शन दें और शीघ्र ही उनकी सुध लें I वे स्वयं को अपने चतुर गिरिधर नागर के चरण-कमलों पर पूरी तरह न्योछावर कर चुकी हैं I
(ख) "म्हारे घर आवौ.................राषो जी मेरे माण।"
उत्तर: प्रसंग: ये पंक्तियाँ मीराँबाई द्वारा रचित 'पद-त्रय' के द्वितीय पद से उद्धृत हैं I
व्याख्या: यहाँ मीराँबाई अपने प्रियतम 'सुंदर श्याम' को अपने घर आने का भावपूर्ण आमंत्रण दे रही हैं I वे विरह की वेदना व्यक्त करते हुए कहती हैं कि आपके दर्शन के बिना मैं सुध-बुध खो बैठी हूँ और मेरा शरीर पके हुए पत्ते की तरह पीला पड़ गया है I मीराँ स्पष्ट करती हैं कि उन्हें संसार में किसी अन्य से कोई आशा नहीं है, उनका पूरा ध्यान केवल प्रभु पर ही केंद्रित है I वे कृष्ण से प्रार्थना करती हैं कि वे शीघ्र आकर उनसे मिलें और उनके मान-सम्मान की रक्षा करें I
(ग) "राम नाम रस पीजै...............ताहि के रंग में भीजै।"
उत्तर: प्रसंग: यह अंश मीराँबाई के 'पद-त्रय' के तृतीय पद से लिया गया है I
व्याख्या: इन पंक्तियों में मीराँबाई मनुष्य मात्र को सांसारिक मोह त्यागकर भक्ति मार्ग पर चलने का संदेश दे रही हैं I वे मन को समझाते हुए कहती हैं कि हे मनुष्य! तू राम (कृष्ण) नाम के प्रेम-रस का पान कर I कुसंगति को त्यागकर सत्संग में बैठ और नित्य हरि की चर्चा सुन I वे मनुष्य को काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह जैसे शत्रुओं को हृदय से निकाल बाहर करने का उपदेश देती हैं ताकि वह पूरी तरह से प्रभु कृष्ण के प्रेम-रंग में सराबोर हो सके I
भाषा एवं व्याकरण-ज्ञान
1. निम्नांकित शब्दों के तत्सम रूप लिखो :
किरपा, दरसन, आसा, चरचा, स्याम, धरम, किशन, हरख
उत्तर:
| तद्भव/अर्ध-तत्सम | तत्सम रूप |
| किरपा | कृपा |
| दरसन | दर्शन |
| आसा | आशा |
| चरचा | चर्चा |
| स्याम | श्याम |
| धरम | धर्म |
| किशन | कृष्ण |
| हरख | हर्ष |
2. वाक्यों में प्रयोग करके निम्नलिखित लगभग समोच्चरित शब्द जोड़ों के अर्थ का अंतर स्पष्ट करो :
संसार—संचार, चरण—शरण, दिन—दीन, कुल—कूल, कली—कलि, प्रसाद—प्रासाद, अभिराम—अविराम, पवन—पावन
उत्तर: संसार (दुनिया): अब सारा संसार मीराँ की कृष्ण-भक्ति को जान गया है।
संचार (फैलाव): समाचार पत्रों के माध्यम से सूचनाओं का संचार होता है।
चरण (पाँव): मीराँबाई प्रभु के चरण-कमलों पर बलिहार जाती हैं।
शरण (आश्रय): मीराँबाई गोपाल जी की शरण में आ गई हैं।
दिन (दिवस): मीराँ दिन-रात अपने प्रभु के साथ खेलती थीं।
दीन (गरीब): हमें दीन-दुखियों की सहायता करनी चाहिए।
कुल (वंश): मीराँ का जन्म राठौड़ कुल में हुआ था।
कूल (किनारा): यमुना के कूल पर कृष्ण रास रचाते थे।
कली (अधखिला फूल): उपवन में गुलाब की कली खिली है।
कलि (कलियुग): कलि काल में नाम स्मरण ही मोक्ष का साधन है।
प्रसाद (कृपा स्वरूप भोजन): मंदिर में भक्तों को प्रसाद मिला।
प्रासाद (महल): मीराँ अपने प्रभु की खोज में राजप्रासाद से निकल पड़ीं।
अभिराम (सुंदर): कृष्ण का रूप अत्यंत अभिराम है।
अविराम (बिना रुके): वर्षा अविराम हो रही है।
पवन (हवा): शीतल पवन चल रही है।
पावन (पवित्र): मीराँ के पद त्रिवेदी संगम के समान पावन हैं।
3. निम्नलिखित शब्दों के लिंग-परिवर्तन करो :
कवि, अधिकारिणी, बालिका, दादा, पति, भगवान, भक्तिन
उत्तर:
| पुलिंग (Masculine) | स्त्रीलिंग (Feminine) |
| कवि | कवयित्री |
| अधिकारी | अधिकारिणी |
| बालक | बालिका |
| दादा | दादी |
| पति | पत्नी |
| भगवान | भगवती |
| भक्त | भक्तिन |
4. विलोमार्थक शब्द लिखो :
पूर्ण, सजीव, प्राचीन, कोमल, अपना, विरोध, मिथ्या, कुसंग, सुंदर, अपमान, गुप्त, आनंद
उत्तर:
| शब्द | विलोम (विपरीतार्थक) शब्द |
| पूर्ण | अपूर्ण |
| सजीव | निर्जीव |
| प्राचीन | नवीन |
| कोमल | कठोर |
| अपना | पराया |
| विरोध | समर्थन |
| मिथ्या | सत्य |
| कुसंग | सत्संग |
| सुंदर | कुरूप |
| अपमान | मान / सम्मान |
| गुप्त | प्रकट |
| आनंद | शोक |
5. निम्नलिखित शब्दों के वचन-परिवर्तन करो :
कविता, निधि, कवि, पौधा, कलम, औरत, सखी, बहू
उत्तर:
| एकवचन (Singular) | बहुवचन (Plural) |
| कविता | कविताएँ |
| निधि | निधियाँ |
| कवि | कविगण / कवि |
| पौधा | पौधे |
| कलम | कलमें |
| औरत | औरतें |
| सखी | सखियाँ |
| बहू | बहुएँ |