पाठ - 7
मणि-कांचन संयोग
अभ्यासमाला
| बोध एवं विचार
1. सही विकल्प का चयन करो :
1. धुवाहाटा-बेलगुरि नामक पवित्र स्थान कहाँ स्थित है ?
(क) बरपेटा में
(ख) माजुली में
(ग) पाटबाउसी में
(घ) कोचबिहार में
उत्तर: (ख) माजुली में
2. शंकरदेव के साथ शास्त्रार्थ से पहले माधवदेव थे -
(क) शाक्त
(ख) शैव
(ग) वैष्णव
(घ) सूर्योपासक
उत्तर: (क) शाक्त
3. सांसारिक जीवन में शंकरदेव और माधवदेव का कैसा संबंध था ?
(क) चाचा-भीतजे
(ख) भाई-भाई का
(ग) मामा-भांजे का
(घ) मित्र-मित्र का
उत्तर: (ग) मामा-भांजे का
4. शंकरदेव के मुँह से किस ग्रंथ का श्लोक सुनकर माधवदेव निरुत्तर हो गए थे ?
(क) ‘गीता’ का
(ख) ‘रामायण’ का
(ग) ‘महाभारत’ का
(घ) ‘भागवत’ का
उत्तर: (घ) ‘भागवत’ का
2. किसने किससे कहा, बताओ:
1. ‘माँ को शीघ्र स्वस्थ कर दो।’
उत्तर: माधवदेव ने देवी गोसानी से (मनौती मानते हुए) कहा I
2. ‘बलि चढ़ाना विनाशकारी कार्य है।’
उत्तर: बहनोई रामदास ने माधवदेव से कहा I
3. ‘अब तक मैंने कितने ही धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया है।’
उत्तर: माधवदेव ने अपने बहनोई रामदास से कहा I
4. ‘वे एक ही बात से तुम्हें निरुत्तर कर देंगे।’
उत्तर: रामदास ने माधवदेव से (शंकरदेव के संदर्भ में) कहा I
5. ‘यह दीघल-पुरीया गिरि का पुत्र माधव है।’
उत्तर: रामदास ने गुरु शंकरदेव से कहा I
3. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो:
(क) विश्व का सबसे बड़ा नदी-द्वीप माजुलि कहाँ बसा हुआ है?
उत्तर: विश्व का सबसे बड़ा नदी-द्वीप माजुलि महाबाहु ब्रह्मपुत्र की गोद में बसा हुआ है ।
(ख) श्रीमंत शंकरदेव का जीवन-काल किस ई. से किस ई. तक व्याप्त है?
उत्तर: श्रीमंत शंकरदेव का जीवन-काल ई. 1449 से 1568 तक व्याप्त है ।
(ग) शंकर-माधव का मिलना असम-भूमि के लिए कैसा साबित हुआ?
उत्तर: शंकर-माधव का मिलना पावन असम-भूमि के लिए 'सोने में सुगंध' जैसा साबित हुआ ।
(घ) महाशक्ति का आगार ब्रह्मपुत्र क्या देखकर अत्यंत हर्षित हो उठा था?
उत्तर: ब्रह्मपुत्र अपनी गोद में मामा-भांजे (शंकर-माधव) को गुरु-शिष्य बनते देखकर अत्यंत हर्षित हो उठा था ।
(ङ) माधवदेव को शिष्य के रूप में स्वीकार कर लेने के बाद शंकरदेव क्या बोले?
उत्तर: माधवदेव को शिष्य के रूप में स्वीकार करने के बाद शंकरदेव आनंदमग्न होकर बोले— "तुम्हें पाकर आज मैं पूरा हुआ" ।
(च) किस घटना से असम के सांस्कृतिक इतिहास में एक सुनहरे अध्याय का श्रीगणेश हुआ था?
उत्तर: धुवाहाटा-बेलगुरि में हुए शंकरदेव और माधवदेव के महामिलन की घटना से असम के सांस्कृतिक इतिहास में एक सुनहरे अध्याय का श्रीगणेश हुआ ।
4. अति संक्षिप्त उत्तर दो (लगभग 25 शब्दों में):
(क) ब्रह्मपुत्र नद किस प्रकार शंकरदेव-माधवदेव के महामिलन का साक्षी बना था?
उत्तर: शंकर-माधव के महामिलन की घटना ब्रह्मपुत्र के तट पर हुई थी । ब्रह्मपुत्र ने मामा-भांजे को गुरु-शिष्य के पवित्र बंधन में बंधते देखा और इस मिलन की खुशी को अपनी जल-धारा के जरिए हिंद महासागर तक पहुँचाया ।
(ख) धुवाहाटा-बेलगुरि सत्र में रहते समय श्रीमंत शंकरदेव किस महान प्रयास में जुटे हुए थे?
उत्तर: उन दिनों शंकरदेव असमीया समाज को तंत्र-मंत्र, बलि-विधान और कठोर बाह्याचारों से मुक्त करने के प्रयास में जुटे थे । वे समाज को आध्यात्मिक उन्नति का सरल मार्ग (एकशरण नाम-धर्म) दिखाना चाहते थे ।
(ग) माधवदेव ने कब और क्या मनौती मानी थी?
उत्तर: जब माधवदेव को अपनी माँ की सख्त बीमारी की खबर मिली, तब वे अत्यंत चिंतित हो उठे । उन्होंने देवी गोसानी से मनौती मानी कि यदि माँ स्वस्थ हो गईं, तो वे उन्हें सफेद बकरों का एक जोड़ा भेंट करेंगे ।
(घ) ‘इसके लिए आवश्यक धन देकर माधवदेव व्यापार के लिए निकल पड़े।’ – प्रस्तुत पंक्ति का संदर्भ स्पष्ट करो।
उत्तर: माँ के स्वस्थ होने पर माधवदेव ने अपनी मनौती पूरी करने का निश्चय किया । उन्होंने अपने बहनोई रामदास को सफेद बकरों का जोड़ा खरीदकर रखने के लिए कहा और इसके लिए जरूरी पैसे देकर स्वयं व्यापार के लिए चले गए ।
(ङ) ‘माधवदेव आप से शास्त्रार्थ करने के लिए आया है।’ – किसने किससे और किस परिस्थिति में ऐसा कहा था?
उत्तर: यह बात बहनोई रामदास ने गुरु शंकरदेव से कही थी । जब बलि-विधान को लेकर माधवदेव और रामदास के बीच बहस हुई, तो रामदास माधवदेव को लेकर शंकरदेव के पास पहुँचे ताकि वे शास्त्रों के सही अर्थ समझ सकें ।
5. संक्षेप में उत्तर दो ( लगभग 50 शब्दों में ) :
क) शंकर-माधव के महामिलन के संदर्भ में ‘मणि-कांचन संयोग’ आख्या की सार्थकता स्पष्ट करो।
उत्तर: असमीया साहित्य के दिग्गज लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा ने शंकरदेव और माधवदेव के मिलन को 'मणि-कांचन संयोग' कहा है। जिस प्रकार मणि और सोने का मिलन अत्यंत दुर्लभ और मूल्यवान होता है, वैसे ही यह मिलन भी था। इस घटना ने असम के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इतिहास को नई दिशा दी। जहाँ शंकरदेव एक योग्य गुरु थे, वहीं उन्हें माधवदेव के रूप में एक अत्यंत योग्य और समर्पित शिष्य मिला, जिससे वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार तीव्र हो गया।
ख) बहनोई रामदास के घर पहुँचने पर माधवदेव ने क्या पाया और उन्होंने क्या किया?
उत्तर: जब माधवदेव अपने बहनोई रामदास के घर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि देवी गोसानी की कृपा से उनकी बीमार माँ अब स्वस्थ होने लगी थीं। यह देखकर माधवदेव को बहुत राहत मिली और उन्होंने अत्यंत कृतज्ञता के साथ देवी को प्रणाम किया। अपनी पूर्व प्रतिज्ञा (मनौती) को पूरा करने के लिए उन्होंने बहनोई रामदास को सफेद बकरों का एक जोड़ा खरीदने के लिए आवश्यक धन दिया और स्वयं व्यापार के काम से बाहर चले गए।
ग) रामदास ने बलि-विधान के विरोध में माधवदेव से क्या-क्या कहा?
उत्तर: रामदास ने गुरु शंकरदेव से प्राप्त ज्ञान के आधार पर बलि-प्रथा का कड़ा विरोध किया। उन्होंने माधवदेव से कहा कि बलि चढ़ाना एक विनाशकारी कार्य है और इससे किसी पुण्य की प्राप्ति नहीं होती। उन्होंने तर्क दिया कि इस लोक में जीव की हत्या करने वाले को अगले जन्म में उसी जीव के हाथों कटना पड़ता है। रामदास ने स्पष्ट किया कि बिना किसी कारण दूसरे जीव की हत्या करना पूरी तरह व्यर्थ और अधार्मिक है।
घ) शास्त्रार्थ के दौरान शंकरदेव द्वारा उद्धृत ‘भागवत’ के श्लोक का अर्थ सरल हिन्दी में प्रस्तुत करो।
उत्तर: शंकरदेव ने भागवत का श्लोक उद्धृत करते हुए समझाया कि जिस प्रकार किसी वृक्ष की जड़ में पानी देने से उसकी टहनियाँ, पत्ते, फूल और फल स्वयं ही पोषित और जीवित हो जाते हैं, अथवा जिस प्रकार भोजन ग्रहण कर प्राणों को संतुष्ट करने से शरीर की सभी इंद्रियाँ तृप्त हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार परब्रह्म श्री कृष्ण की भक्ति और उपासना करने से संसार के अन्य सभी देवी-देवता स्वतः ही संतुष्ट हो जाते हैं।
ङ) शंकरदेव की साहित्यिक देन के बारे में बताओ।
उत्तर: श्रीमंत शंकरदेव ने असमीया साहित्य और संस्कृति को अत्यंत समृद्ध किया है। उनकी प्रमुख काव्य रचनाओं में 'कीर्तन-घोषा', 'गुणमाला', 'भक्ति-प्रदीप', 'हरिश्चंद्र उपाख्यान' और 'रुक्मिणी-हरण काव्य' शामिल हैं। उन्होंने 'पत्नीप्रसाद', 'केलिगोपाल', 'कालियदमन' और 'रामविजय' जैसे प्रसिद्ध छह अंकीया नाटकों (अंकिया नाट) की रचना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने 'बरगीत' भी रचे, जो आज भी असम के जन-मानस में भक्ति रस घोलते हैं।
च) माधवदेव की साहित्यिक देन को स्पष्ट करो।
उत्तर: गुरु शंकरदेव की प्रेरणा से माधवदेव ने भी अनमोल साहित्यिक कृतियों की रचना की। उनकी सबसे महत्वपूर्ण रचना 'नामघोषा' है, जिसका असमीया समाज में 'रामचरितमानस' जैसा ही उच्च स्थान है। उन्होंने 'जन्मरहस्य', 'राजसूय' और 'भक्ति रत्नावली' जैसे काव्य ग्रंथ लिखे। नाट्य क्षेत्र में उन्होंने 'चोर-धरा', 'भोजन-बिहार' और 'दधि-मंथन' जैसे नाटकों की रचना की और 191 अत्यंत मधुर 'बरगीत' भी समाज को दिए।
6. सम्यक् उत्तर दो ( लगभग 100 शब्दों में ) :
क) माधवदेव की माँ की बीमारी के प्रसंग को सरल हिन्दी में वर्णित करो।
उत्तर: माधवदेव जब अपनी पैतृक संपत्ति अपने बड़े भाई को सौंपकर बांडुका से वापस लौट रहे थे, तब उन्हें सूचना मिली कि उनकी माँ अत्यंत बीमार हैं। उनकी माँ उस समय भांडारीडुबि में उनकी बहन उर्वशी और बहनोई रामदास के साथ रह रही थीं। अपनी माँ के गिरते स्वास्थ्य को लेकर माधवदेव गहरे संकट और चिंता में डूब गए। इसी व्याकुलता में उन्होंने देवी गोसानी से एक मनौती मानी कि यदि उनकी माँ शीघ्र स्वस्थ हो जाती हैं, तो वे देवी को सफेद बकरों का एक जोड़ा बलि के रूप में अर्पित करेंगे। सौभाग्य से जब वे अपनी बहन के घर पहुँचे, तो उन्होंने पाया कि माँ के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। इसे देवी की कृपा मानकर उन्होंने कृतज्ञता व्यक्त की और मनौती पूरी करने हेतु बकरे खरीदने के लिए रामदास को धन देकर स्वयं व्यापार के लिए प्रस्थान कर गए।
ख) बलि हेतु बकरे खरीदने को लेकर रामदास और माधवदेव के बीच हुई बातचीत को अपने शब्दों में प्रस्तुत करो।
उत्तर: व्यापार से लौटने के बाद जब माधवदेव ने रामदास से बकरों के बारे में पूछा, तो रामदास ने उत्तर दिया कि उन्होंने बकरे तय तो कर लिए हैं पर उन्हें मालिक के पास ही छोड़ दिया है। पूजा के दिन पास आने पर जब माधवदेव ने बकरे लाने को कहा, तो रामदास ने बलि का विरोध करते हुए कहा कि जीव हत्या विनाशकारी है और जो इस लोक में बकरे काटता है, उसे परलोक में बकरे के हाथों कटना पड़ता है। इस पर माधवदेव क्रोधित हो गए और अपने शास्त्रों के ज्ञान का दंभ दिखाते हुए बोले कि उन्होंने अनेक धर्मशास्त्र पढ़े हैं और सबमें बलि-विधान का निर्देश है। उन्होंने रामदास को चुनौती दी कि वे बताएँ उन्हें ऐसी बातें किस शास्त्र में मिलीं। अंत में, रामदास ने उन्हें शास्त्रार्थ के लिए अपने गुरु शंकरदेव के पास चलने का सुझाव दिया।
ग) रामदास और माधवदेव गुरु शंकरदेव के पास कब और क्यों गए थे?
उत्तर: रामदास और माधवदेव अगले दिन भोर की पावन बेला में धुवाहाता-बेलगुरि सत्र में श्रीमंत शंकरदेव के पास पहुँचे। उनके जाने का मुख्य उद्देश्य बलि-विधान और धर्म के सही स्वरूप पर शास्त्रार्थ करना था। माधवदेव का मानना था कि शास्त्रों में बलि देना अनिवार्य है, जबकि रामदास गुरु शंकरदेव से प्राप्त ज्ञान के आधार पर इसे व्यर्थ और पाप समझते थे। रामदास चाहते थे कि माधवदेव स्वयं गुरु शंकरदेव के मुख से सत्य को सुनें, क्योंकि उनका मानना था कि गुरु एक ही बात से माधवदेव को निरुत्तर कर देंगे। वहीं, माधवदेव अपने ज्ञान के अहंकार में यह साबित करना चाहते थे कि उनका मत ही श्रेष्ठ है। इस प्रकार, सत्य की खोज और धार्मिक मतभेदों को सुलझाने के लिए वे दोनों शंकरदेव की शरण में गए।
घ) शंकरदेव और माधवदेव के बीच किस बात पर शास्त्रार्थ हुआ था? उसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर: शंकरदेव और माधवदेव के बीच मुख्य रूप से 'प्रवृत्ति-मार्ग' और 'निवृत्ति-मार्ग' को लेकर गहन शास्त्रार्थ हुआ था। माधवदेव बलि-विधान और कर्मकांड (प्रवृत्ति) के पक्ष में तर्क दे रहे थे, जबकि शंकरदेव भक्ति और समर्पण (निवृत्ति) के मार्ग पर बल दे रहे थे। घंटों चले इस संवाद में अंततः शंकरदेव ने 'भागवत' का एक श्लोक सुनाया, जिसमें बताया गया था कि जैसे जड़ को सींचने से पूरा वृक्ष फल-फूल जाता है, वैसे ही केवल कृष्ण की भक्ति से सभी देव संतुष्ट हो जाते हैं। इस तर्कपूर्ण और आध्यात्मिक श्लोक को सुनकर माधवदेव निरुत्तर हो गए और उनका ज्ञान-दंभ चूर-चूर हो गया। इसका सुखद परिणाम यह निकला कि माधवदेव ने शंकरदेव को अपना गुरु स्वीकार कर लिया और उनके परम शिष्य बन गए।
ङ) शंकर-माधव के महामिलन के शुभ परिणाम किन रूपों में निकले?
उत्तर: शंकर-माधव का मिलन असम के सांस्कृतिक इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ साबित हुआ, जिसे 'मणि-कांचन संयोग' कहा जाता है। इसके शुभ परिणाम अनेक रूपों में सामने आए:
धर्म का प्रसार: एकशरण नाम-धर्म और कृष्ण-भक्ति की धारा पूरे असम और पूर्वोत्तर भारत में तेजी से फैल गई।
साहित्यिक समृद्धि: दोनों महापुरुषों ने मिलकर 'कीर्तन-घोषा', 'नामघोषा', 'बरगीत' और 'अंकिया नाट' जैसी कालजयी रचनाएँ कीं, जिससे असमीया भाषा और साहित्य समृद्ध हुआ।
सामाजिक सुधार: समाज से बलि-प्रथा, अंधविश्वास और जटिल कर्मकांडों का अंत हुआ और एक सरल, भक्तिपूर्ण समाज की नींव पड़ी।
सांस्कृतिक एकता: इस मिलन ने असम के कला, संगीत और नाटक के क्षेत्र में एक नए सुनहरे अध्याय का श्रीगणेश किया, जो आज भी असमीया पहचान का आधार है।