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    Unit 1

    निर्धारित पाठ्य-पुस्तक : आधुनिक काव्य संग्रह – रामवीर सिंह (संपा०), विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसीभारतेन्दु (भारत वीरत्व, यमुना-शोभा)निर्धारित पाठ्य-पुस्तक : राष्ट्रवाणी – डॉ० वासुदेव सिंह (संपा०), संजय बुक सेंटर, वाराणसीमैथिलीशरण गुप्त (मातृभूमि, मनुष्यता, हमारी सभ्यता)



    अति संक्षिप्त प्रश्नोत्तर :

    1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म कब हुआ था? [GU 2023]

    उत्तर: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 ईस्वी को वाराणसी (काशी) में हुआ था।

    2. मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित किसी एक खण्डकाव्य का नाम लिखिए। [GU 2023]

    उत्तर: 'पंचवटी' (अथवा 'जयद्रथ वध')।

    3. 'भारत वीरत्व' कविता के रचयिता कौन हैं?

    उत्तर: 'भारत वीरत्व' कविता के रचयिता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हैं।

    4. 'यमुना-शोभा' कविता भारतेन्दु जी की किस प्रसिद्ध कृति से उद्धृत है?

    उत्तर: यह कविता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रसिद्ध कृति 'चंद्रावली' नाटिका से उद्धृत है।

    5. मैथिलीशरण गुप्त को 'राष्ट्रकवि' की उपाधि किसने प्रदान की थी?

    उत्तर: महात्मा गाँधी ने उनकी राष्ट्रीय कृति 'भारत-भारती' के प्रभाव को देखकर उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि दी थी।

    6. 'मनुष्यता' कविता के अनुसार वास्तविक मनुष्य कौन है?

    उत्तर: वास्तविक मनुष्य वही है जो संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए जिए और दूसरों के हितार्थ अपने प्राणों का उत्सर्ग करे ("वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे")।

    7. मैथिलीशरण गुप्त का जन्म किस वर्ष और कहाँ हुआ था?

    उत्तर: उनका जन्म 3 अगस्त 1886 ईस्वी को चिरगांव, झाँसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था।

    8. 'मातृभूमि' कविता में कवि ने मातृभूमि के मुकुट के रूप में किसे चित्रित किया है?

    उत्तर: कवि ने सूर्य और चंद्रमा को मातृभूमि के मुकुट के रूप में चित्रित किया है।

    9. आधुनिक हिन्दी खड़ी बोली कविता के प्रवर्तक किस युग के रचनाकार माने जाते हैं?

    उत्तर: भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग (विशेष रूप से महावीर प्रसाद द्विवेदी और भारतेन्दु हरिश्चंद्र की परंपरा)।

    10. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के पिता का नाम क्या था, जो स्वयं ब्रजभाषा के कवि थे?

    उत्तर: उनके पिता का नाम बाबू गोपालचंद्र (उपनाम 'गिरिधरदास') था।

    11. मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत रचना 'भारत-भारती' का प्रकाशन वर्ष क्या है?

    उत्तर: 'भारत-भारती' का प्रकाशन वर्ष 1912 ईस्वी है।

    12. 'हमारी सभ्यता' कविता में गुप्त जी ने भारत के किस रूप का स्मरण कराया है?

    उत्तर: भारत के गौरवशाली, ज्ञानवान और आध्यात्मिक अतीत तथा आदर्श सामाजिक मूल्यों का।

    13. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने मुख्य रूप से किस भाषा को पद्य रचना का माध्यम बनाया?

    उत्तर: भारतेन्दु जी ने पद्य रचना के लिए मुख्य रूप से ब्रजभाषा और गद्य के लिए खड़ी बोली का प्रयोग किया।

    14. 'मातृभूमि' कविता में 'शेषनाग' को किस रूप में दर्शाया गया है?

    उत्तर: मातृभूमि के सिंहासन या शेषनाग के फन को उसके पाताल-तल के संबल/सिंहासन रूप में वर्णित किया गया है।

    15. 'सच्चा आत्मबलिदान' गुप्त जी के अनुसार किस कविता का केंद्रीय विचार है?

    उत्तर: 'मनुष्यता' कविता का।

    2 अंक वाले प्रश्न (लगभग 50 शब्द) :

    1. भारतेन्दु के काव्य की दो भाषिक विशेषताएँ लिखिए। [GU 2023]

    उत्तर: भारतेन्दु जी के काव्य की प्रमुख भाषिक विशेषताएँ:

    • ब्रजभाषा का माधुर्य: काव्य रचना में इन्होंने परंपरागत, सरस और माधुर्यपूर्ण ब्रजभाषा का स्वाभाविक प्रयोग किया है।

    • मुहावरेदार व व्यावहारिक शैली: लोक-प्रचलित देशज शब्दों, लोकोक्तियों तथा प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग करके भाषा को अत्यंत जीवंत और जन-संवादी बनाया।

    2. 'यमुना-शोभा' कविता में जल में पड़ते चंद्रमा के बिंब का क्या सौंदर्य व्यक्त हुआ है?

    उत्तर: यमुना के चंचल जल में जब चंद्रमा का प्रतिबिंब पड़ता है, तो लहरों के हिलने से वह कभी एक और कभी अनेक रूपों में दिखाई देता है। कवि को ऐसा प्रतीत होता है मानो चंद्रमा जल रूपी दर्पण में अपना मुख देखने के लिए बार-बार झुक रहा हो अथवा यमुना की जलक्रीड़ा का आनंद ले रहा हो।

    3. 'भारत वीरत्व' कविता में भारतेन्दु जी ने भारतीय वीरों की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?

    उत्तर: कवि ने भारतीय वीरों के अदम्य साहस, निर्भीकता, त्याग और मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने की परंपरा को रेखांकित किया है। इसमें प्राचीन क्षत्रिय धर्म, युद्ध-कौशल और धर्म व सत्य के लिए लड़ने वाले महापुरुषों के शौर्य का स्मरण कराया गया है।

    4. 'मातृभूमि' कविता के अनुसार प्रकृति किस प्रकार भारत भूमि की सेवा करती है?

    उत्तर: प्रकृति मातृभूमि की सेवा एक सेवक की भाँति करती है। सूर्य और चंद्रमा इसका मुकुट बनकर चमकते हैं, सागर इसके चरणों को पखारता है, नदियाँ प्रेम-प्रवाह रूपी जल बहाती हैं, फूल और तारे इसके आभूषण हैं, तथा पवन निरंतर इसे सुगंधित और शीतल बनाए रखता है।

    5. 'मनुष्यता' कविता में 'सहानुभूति' को सबसे बड़ा धन क्यों कहा गया है?

    उत्तर: मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार करुणा और परोपकार ही मनुष्य का सबसे अलौकिक गुण है। जिसके मन में दूसरों के कष्ट को समझने की शक्ति और सहानुभूति होती है, वही ईश्वरत्व प्राप्त करता है और पूरी पृथ्वी उसकी वशीभूता (वश में) हो जाती है। स्वार्थ त्याग ही मानवता का मूल आधार है।

    6. 'हमारी सभ्यता' कविता में आधुनिक सभ्यता पर क्या व्यंग्य किया गया है?

    उत्तर: कवि ने स्पष्ट किया है कि आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता बाह्य भौतिक चमक-दमक और स्वार्थ पर टिकी है, जबकि हमारी प्राचीन सभ्यता त्याग, नैतिकता और आत्म-कल्याण पर आधारित थी। बाह्य विकास के नाम पर आंतरिक मूल्यों और नैतिक पतन की उपेक्षा करना सभ्यता नहीं है।

    7. मैथिलीशरण गुप्त को 'सामंजस्यवादी कवि' क्यों कहा जाता है?

    उत्तर: गुप्त जी ने अपने काव्य में प्राचीन आदर्शों (वैदिक व पौराणिक) और आधुनिक राष्ट्रीय जागरण के विचारों का सुंदर समन्वय किया है। उन्होंने परंपरा का अंधानुकरण न करके उसमें आधुनिक सुधारवादी और मानवीय दृष्टिकोण का सफल समावेश किया।

    8. भारतेन्दु युग की 'देशभक्ति और राजभक्ति के द्वंद्व' को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: भारतेन्दु युगीन कवियों ने ब्रिटिश शासन के सुव्यवस्थित प्रबंध और आधुनिक तकनीकी साधनों की सराहना की (राजभक्ति), किंतु साथ ही भारत से होने वाले आर्थिक दोहन, गरीबी और पराधीनता के शोषण का खुलकर विरोध किया (सच्ची देशभक्ति)।

    9. 'रन्तिदेव' और 'दधीचि' का उदाहरण देकर 'मनुष्यता' कविता में कवि क्या समझाना चाहते हैं?

    उत्तर: कवि यह संदेश देते हैं कि नश्वर देह की चिंता किए बिना परहित में सर्वस्व दान कर देना ही अमरता का मार्ग है। राजा रन्तिदेव ने भूख से व्याकुल होकर भी अपना भोजन याचक को दे दिया और महर्षि दधीचि ने लोक-कल्याण के लिए अपनी अस्थियाँ तक दान कर दीं।

    10. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के काव्य में 'प्रकृति चित्रण' का स्वरूप कैसा है?

    उत्तर: भारतेन्दु जी के काव्य में प्रकृति का आलंबन और उद्दीपन दोनों रूपों में चित्रण मिलता है। 'यमुना-शोभा' में उन्होंने परंपरावादी शैली में अलंकारों, उपमाओं और बिंबों के माध्यम से यमुना के तट, तरंगों और जलीय सौंदर्य का सजीव और काव्यात्मक वर्णन किया है।

    11. मैथिलीशरण गुप्त की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?

    उत्तर: गुप्त जी ने खड़ी बोली को काव्य की मधुर और लचीली भाषा बनाया। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ, व्याकरणसम्मत, सरल, सुबोध और ओजस्वी है। उनकी शैली में गेयता, इतिवृत्तात्मकता, प्रगीतात्मकता और उपदेशात्मकता का सुंदर संतुलन दिखता है।

    12. 'भारत वीरत्व' कविता का मुख्य उद्देश्य क्या है?

    उत्तर: इस कविता का मुख्य उद्देश्य पराधीनता और आलस्य में सोए हुए तत्कालीन भारतीय समाज को उनके पूर्वजों के गौरवशाली शौर्य, आत्म-सम्मान और वीरता की याद दिलाकर उनमें राष्ट्रीय चेतना और कर्मठता का संचार करना है।

    13. 'मनुष्यता' कविता में 'अमर्त्य अंक में अपंक हो चढ़ो सभी' पंक्ति का भावार्थ क्या है?

    उत्तर: इसका अर्थ है कि मनुष्य को निष्कलंक, पवित्र और स्वार्थरहित कर्म करते हुए जीवन जीना चाहिए, ताकि मृत्यु के उपरांत भी वह देवतुल्य बनकर परमात्मा की पावन गोद (अमरत्व) में बिना किसी पाप के स्थान प्राप्त कर सके।

    14. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के साहित्यिक योगदान का संक्षेप में मूल्यांकन कीजिए।

    उत्तर: भारतेन्दु जी को आधुनिक हिन्दी साहित्य का जनक माना जाता है। उन्होंने साहित्य को दरबारी वातावरण और रीतिवादी शृंगार से निकालकर समाज, देश-प्रेम, जन-समस्याओं और समसामयिक यथार्थ के साथ सीधे जोड़ दिया।

    15. 'मातृभूमि' कविता में 'सगुण मूर्ति सर्वेश की' किसे और क्यों कहा गया है?

    उत्तर: मातृभूमि को ही प्रत्यक्ष ईश्वर (सर्वेश) की साकार प्रतिमा कहा गया है, क्योंकि जिस प्रकार ईश्वर सबका पालन-पोषण करता है, उसी प्रकार मातृभूमि अन्न, जल, वायु और आश्रय देकर अपने समस्त संतानों का बिना किसी भेदभाव के भरण-पोषण करती है।

    5 अंक वाले प्रश्न (प्रत्येक उत्तर लगभग 200 शब्द) :

    1. 'मातृभूमि' कविता के द्वारा कवि मैथिलीशरण गुप्त क्या संदेश देना चाहते हैं, स्पष्ट कीजिए। [GU 2023]

    उत्तर: राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित 'मातृभूमि' कविता एक ओजस्वी और देशभक्ति से परिपूर्ण रचना है। इस कविता का प्रमुख उद्देश्य भारतीय जनमानस में अपनी पावन भूमि के प्रति अगाध श्रद्धा, गौरवबोध और राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार करना है।

    कवि ने भारत भूमि को केवल मिट्टी का टुकड़ा न मानकर साक्षात् 'सगुण मूर्ति सर्वेश की' स्वीकार किया है। वे संदेश देते हैं कि जिस मातृभूमि की रज में खेलकर हम बड़े हुए, जिसके अन्न-जल और वायु से हमारा शरीर पुष्ट हुआ, उसके प्रति कृतज्ञ होना प्रत्येक देशवासी का सर्वोच्च धर्म है। कविता में प्राकृतिक सौंदर्य के माध्यम से देश की समृद्धि का गान किया गया है—नदियों का निर्मल जल, फल-फूलों से लदे वृक्ष, रत्नों से भरी वसुंधरा और आकाश का छत्र इस धरा की दिव्यता को प्रकट करते हैं।

    कवि यह प्रेरक संदेश स्थापित करते हैं कि हमें जाति, धर्म और संप्रदाय के संकीर्ण बंधनों से ऊपर उठकर मातृभूमि की स्वतंत्रता, अखंडता और विकास के लिए समर्पित रहना चाहिए। देश सेवा और आत्म-बलिदान ही जीवन की सार्थकता है। इस प्रकार, यह कविता पराधीनता के दौर में जन-जागरण का महामंत्र बनी और आज भी देशप्रेम व स्वाभिमान का शाश्वत संदेश देती है।

    2. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की कविता 'यमुना-शोभा' के भाव-सौंदर्य और शिल्प-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।

    उत्तर: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की 'यमुना-शोभा' आधुनिक काल में ब्रजभाषा की अत्यंत ललित और सरस प्रकृति-काव्य की बानगी प्रस्तुत करती है। इस कविता में यमुना नदी के तट, उसकी चंचल लहरों और जल में प्रतिबिंबित आकाशीय दृश्यों का मनोहारी चित्रण किया गया है।

    भाव-सौंदर्य: कवि ने यमुना के जल में चमकते चंद्रमा और तारों के बिंब को देखकर अनेक उत्प्रेक्षाओं की रचना की है। कभी लगता है कि यमुना का जल कृष्ण के पावन चरणों का स्पर्श करने को लालायित है, तो कभी प्रतीत होता है कि चंद्रमा रूपी दर्पण में रात अपना रूप निहार रही है। यहाँ प्रकृति केवल जड़ नहीं, बल्कि चेतन और भक्ति-भाव से सराबोर दिखाई देती है। राधा-कृष्ण की लीलाभूमि होने के कारण यमुना का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी भाव-पक्ष को समृद्ध करता है।

    शिल्प-सौंदर्य:

    • भाषा: शुद्ध, माधुर्य गुण से युक्त सरस ब्रजभाषा।

    • छंद: छप्पय छंद का अत्यंत सधा हुआ और लयात्मक प्रयोग।

    • अलंकार: अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, रूपक, और संदेह अलंकारों की प्रचुरता है। "तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए" जैसी पंक्तियाँ अनुप्रास के नाद-सौंदर्य का अनुपम उदाहरण हैं।

    3. मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में चित्रित राष्ट्रीय भावना पर प्रकाश डालिए। [GU 2023]

    उत्तर: मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि हैं, जिन्हें उनकी तीव्र देशभक्ति और युगीन चेतना के कारण 'राष्ट्रकवि' के सम्मान से अलंकृत किया गया। उनके संपूर्ण काव्य का केंद्रीय स्वर राष्ट्रीय जागरण, मातृभूमि के प्रति अनन्य अनुराग और भारतीय संस्कृति का गौरवगान है।

    गुप्त जी की राष्ट्रीय चेतना के प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं:

    • अतीत का गौरवगान: उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति 'भारत-भारती' तथा 'हमारी सभ्यता' जैसी कविताओं में भारत के गौरवशाली अतीत, ज्ञान-विज्ञान और उच्च नैतिक मूल्यों का स्मरण कराकर वर्तमान की हीनभावना को मिटाने का प्रयास किया।

    • मातृभूमि की वंदना: 'मातृभूमि' कविता में वे देश को साक्षात् परमात्मा का प्रत्यक्ष रूप मानकर उसके कण-कण के प्रति समर्पण की भावना जाग्रत करते हैं।

    • मानवतावादी व संप्रदायरहित दृष्टि: उनकी राष्ट्रीयता संकीर्ण नहीं, बल्कि विश्व-कल्याण और सर्वधर्म समभाव पर टिकी है।

    • स्वाधीनता का आह्वान: पराधीनता को सबसे बड़ा अभिशाप मानते हुए उन्होंने देशवासियों को कर्मपथ पर अग्रसर होने और स्वाधीनता संग्राम में सर्वस्व न्योछावर करने का आह्वान किया।

    संक्षेप में, गुप्त जी का काव्य भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की नैतिक और भावनात्मक रीढ़ बनकर उभरा।

    4. 'मनुष्यता' कविता के आधार पर सिद्ध कीजिए कि परोपकार और त्याग ही सच्ची मानवता है।

    उत्तर: मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध कविता 'मनुष्यता' मानव जीवन की सार्थकता का दार्शनिक और व्यावहारिक विश्लेषण करती है। कवि का स्पष्ट मत है कि केवल सांसारिक जीवन जीना और व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति करना तो पशु-प्रवृत्ति है। सच्चा मनुष्य वही है जो संपूर्ण समष्टि (समाज) के हित के लिए जिए और मरे।

    कवि ने पौराणिक महापुरुषों के ऐतिहासिक उदाहरण देकर त्याग की महत्ता सिद्ध की है:

    • महर्षि दधीचि: जिन्होंने वृत्रासुर के वध और देव-कल्याण के लिए अपनी अस्थियाँ तक सहर्ष दान कर दीं।

    • उशीनर (राजा शिवि): जिन्होंने एक पक्षी (कपोत) के प्राणों की रक्षा हेतु अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया।

    • कर्ण और रन्तिदेव: जिन्होंने अपनी देह का रक्षा-कवच और अंतिम भोजन का थाल याचक को सौंप दिया।

    कवि समझाते हैं कि यह भौतिक शरीर नश्वर है, अतः इससे मोह करना व्यर्थ है। मृत्यु तो निश्चित है, किंतु 'सुमृत्यु' वही है जिसकी मृत्यु के बाद भी समाज उसके सत्कर्मों और परोपकार को याद रखे। जब तक मनुष्य में सहानुभूति, करुणा, आत्मत्याग और विश्व-बंधुत्व की भावना नहीं होगी, तब तक वह सच्चा मनुष्य नहीं कहला सकता।

    5. 'भारत वीरत्व' कविता में भारतेन्दु जी ने नवजागरण के किन स्वरों को अभिव्यक्त किया है?

    उत्तर: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कृत 'भारत वीरत्व' नवजागरण कालीन चेतना से अनुप्राणित एक अत्यंत प्रेरक कविता है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जब भारतीय समाज राजनीतिक पराधीनता, सामाजिक जड़ता और निराशा के अंधकार में डूबा हुआ था, तब भारतेन्दु जी ने इस कविता के माध्यम से जनजागरण का शंखनाद किया।

    प्रमुख नवजागरण कालीन स्वर:

    • ऐतिहासिक शौर्य का पुनःस्मरण: कवि ने प्राचीन काल के वीर योद्धाओं, क्षत्रियों और राष्ट्र-नायकों के अदम्य साहस को प्रस्तुत कर यह याद दिलाया कि भारत वीरों की भूमि रहा है।

    • जड़ता और कायरता पर प्रहार: तत्कालीन समाज की अकर्मण्यता, आपसी फूट और भीरुता पर क्षोभ प्रकट करते हुए उन्होंने आत्मसम्मान से जीने की प्रेरणा दी।

    • सैन्य चेतना और आत्मरक्षा: कविता में यह भाव समाहित है कि जब तक कोई जाति अपनी रक्षा स्वयं करने में सक्षम नहीं होती, उसका अस्तित्व सुरक्षित नहीं रह सकता।

    • राष्ट्रीय स्वाभिमान: भारतेन्दु जी ने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के समानांतर भारतीय पौरुष को पुनः जाग्रत करने का प्रयास किया।

    इस प्रकार, 'भारत वीरत्व' केवल युद्ध का वर्णन नहीं, बल्कि पराधीन भारत को जगाने का एक क्रांतिकारी नवजागरणवादी प्रयास है।

    6. 'हमारी सभ्यता' कविता का मूल प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।

    उत्तर: मैथिलीशरण गुप्त विरचित 'हमारी सभ्यता' कविता भारतीय संस्कृति की सनातन विशेषताओं, नैतिक आदर्शों और उसकी आध्यात्मिक श्रेष्ठता का उद्घाटन करती है। इस कविता का मूल प्रतिपाद्य आधुनिकता की अंधी दौड़ में विलुप्त हो रहे भारतीय जीवन-मूल्यों की पुनर्स्थापना करना है।

    कविता के मुख्य विचार बिंदु:

    • त्याग और संयम की महत्ता: भारतीय सभ्यता का मूल आधार 'भोग' नहीं बल्कि 'त्याग' और 'संयम' है। यहाँ राजाओं ने भी संतों की भाँति जीवन जिया और जनकल्याण को सर्वोपरि माना।

    • आध्यात्मिक दृष्टिकोण: भारतीय संस्कृति ने बाह्य भौतिक सुख-सुविधाओं की अपेक्षा आत्मा के उत्थान और सत्य-अहिंसा को प्राथमिकता दी।

    • वसुधैव कुटुम्बकम्: हमारी सभ्यता में संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानकर सबके कल्याण (सर्वे भवन्तु सुखिनः) की कामना की गई है।

    • पाश्चात्य सभ्यता से तुलना: कवि आगाह करते हैं कि भौतिक उन्नति यदि मनुष्यता और नैतिकता को समाप्त कर दे, तो वह सभ्यता विनाशकारी सिद्ध होती है।

    कवि देशवासियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने और भारतीय सभ्यता के उदात्त मूल्यों को आत्मसात करने का सशक्त संदेश देते हैं।

    7. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के काव्य-शिल्प की प्रमुख प्रवृत्तियों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।

    उत्तर: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिन्दी साहित्य के संक्रांति-काल के निर्माता हैं। उनके काव्य-शिल्प में एक ओर रीतिकालीन शास्त्रीय परंपरा का परिपाक है, तो दूसरी ओर आधुनिक जन-संवेदना की नवीन अभिव्यक्ति मिलती है।

    काव्य-शिल्प की प्रमुख विशेषताएँ:

    • भाषा-प्रयोग: भारतेन्दु जी ने पद्य के लिए सरस और मुहावरेदार ब्रजभाषा का परिमार्जित रूप अपनाया, जिसमें गेयता और माधुर्य का अद्भुत समन्वय है।

    • विविध शैलियाँ: उन्होंने परंपरागत दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया के साथ-साथ लोकगीतों की शैलियों जैसे कजली, ठुमरी, चैती और लावणी का भी सफल प्रयोग किया।

    • रस और अलंकार: उनके काव्य में शृंगार, भक्ति, वीर तथा हास्य-व्यंग्य रसों का सुंदर विन्यास है। अलंकारों का प्रयोग साध्य न होकर भावों का पोषक बनकर आया है (यथा अनुप्रास और उत्प्रेक्षा)।

    • व्यंग्यात्मकता: समकालीन राजनीतिक और सामाजिक कुरीतियों पर चोट करने के लिए उन्होंने तीखे और चुटीले व्यंग्य-शिल्प का आश्रय लिया।

    इस प्रकार, भारतेन्दु जी का काव्य-शिल्प परंपरा और आधुनिकता का एक अत्यंत सजीव सेतु है।

    8. 'मनुष्यता' कविता की प्रासंगिकता वर्तमान संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: मैथिलीशरण गुप्त की कविता 'मनुष्यता' आज के 21वीं सदी के भौतिकतावादी, स्वार्थ-केंद्रित और आत्मकेंद्रित समाज में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है।

    वर्तमान परिदृश्य में जब मनुष्य तकनीक और धन के पीछे भागते हुए संवेदनाहीन हो रहा है, समाज में वैमनस्य, हिंसा, और स्वार्थपरता बढ़ रही है, तब 'मनुष्यता' कविता हमें आत्म-अवलोकन की प्रेरणा देती है। कवि का यह शाश्वत संदेश कि "वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे", आज के युग में नैतिक पतन को रोकने की अचूक औषधि है।

    यह कविता हमें सिखाती है कि धर्म, जाति, भाषा और राष्ट्र की कृत्रिम सीमाओं को तोड़कर एक-दूसरे के प्रति करुणा और सहयोग का भाव रखना चाहिए। जब तक हम वंचितों, पीड़ितों और असहायों के आँसू पोंछने के लिए आगे नहीं आएँगे, तब तक सच्चा सामाजिक विकास संभव नहीं है। अतः यह कविता व्यक्तिगत लोभ से ऊपर उठकर समष्टिगत प्रेम, सहिष्णुता और विश्व-शांति का मार्ग प्रशस्त करती है।

    9. 'यमुना-शोभा' में भारतेन्दु जी के प्रकृति-वर्णन में भक्ति और शृंगार का जो समन्वय मिलता है, उसका विश्लेषण कीजिए।

    उत्तर: 'यमुना-शोभा' कविता में भारतेन्दु जी का प्रकृति-चित्रण केवल स्थूल दृश्यांकन नहीं है, बल्कि वह वैष्णव भक्ति-परंपरा और रीतिकालीन शृंगार-संवेदना के मधुर संगम से आलोकित है।

    कवि यमुना को मात्र एक भौगोलिक नदी नहीं मानते, बल्कि उसे भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी और परम पावन लीला-सहचरी के रूप में देखते हैं। जब वे यमुना के काले जल, लहरों और उन पर पड़ते तारों के प्रतिबिंब का वर्णन करते हैं, तो उसमें शृंगारिक उपमाओं—जैसे नायिका की नीली साड़ी, मोतियों का हार और दर्पण—का अत्यंत नफासत से प्रयोग करते हैं।

    इसके साथ ही, अंतर्धारा में कृष्ण-भक्ति निरंतर प्रवाहित होती रहती है। यमुना के किनारे लगे तमाल के वृक्षों का झुकना कवि को ऐसा प्रतीत कराता है मानो वे झुककर प्रभु के चरणों का ध्यान कर रहे हों या यमुना-जल रूपी चरणामृत का पान कर रहे हों। इस प्रकार, भारतेन्दु जी ने प्रकृति के सौंदर्य में शृंगार के रंगों और भक्ति की निष्ठा का ऐसा ताना-बाना बुना है जो पाठक को भाव-विभोर कर देता है।

    10. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अथवा मैथिलीशरण गुप्त के साहित्यिक अवदान की तुलनात्मक समीक्षा कीजिए।

    उत्तर: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और मैथिलीशरण गुप्त दोनों ही हिन्दी साहित्य के इतिहास-पुरुष हैं, जिन्होंने अपनी युग-चेतना को नई दिशा दी। दोनों के साहित्यिक अवदान की तुलना निम्नलिखित बिंदुओं पर की जा सकती है:

    • युगीन पृष्ठभूमि: भारतेन्दु जी आधुनिकता के संक्रांति-काल (भारतेन्दु युग) के उन्नायक थे, जिन्होंने मध्यकालीन दरबारी जड़ता को तोड़कर साहित्य को राष्ट्र, समाज और जन-जीवन से जोड़ा। वहीं गुप्त जी ने द्विवेदी युग में आकर इस राष्ट्रीय भावना को अधिक व्यवस्थित, अनुशासित और व्यापक स्वरूप प्रदान किया।

    • भाषा का परिष्कार: भारतेन्दु जी के समय गद्य के लिए खड़ी बोली स्वीकृत हो गई थी, किंतु पद्य में ब्रजभाषा का ही वर्चस्व रहा। मैथिलीशरण गुप्त ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के मार्गदर्शन में खड़ी बोली को पद्य की परिपक्व, समर्थ और लोकप्रिय भाषा बनाकर स्थापित किया।

    • काव्य-दृष्टि: भारतेन्दु जी का काव्य लोक-उल्लास, शृंगार, भक्ति और तत्कालीन राजनैतिक व्यंग्य का सुंदर मिश्रण है। गुप्त जी का काव्य मुख्य रूप से इतिवृत्तात्मक, नीतिपरक, भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान और उपेक्षित नारी-पात्रों (यशोधरा, उर्मिला आदि) के उद्धार पर केंद्रित रहा।

    निष्कर्षतः, जहाँ भारतेन्दु जी ने आधुनिक राष्ट्रीय साहित्य का बीजारोपण किया, वहीं मैथिलीशरण गुप्त ने उसे एक पुष्पित-पल्लवित वटवृक्ष का रूप दिया।





















    Unit 2

    निर्धारित पाठ्य-पुस्तक : हिन्दी काव्य सुधा – प्रो० भूपेन रायचौधुरी (संपा०), गौहाटी विश्वविद्यालय प्रकाशन हरिऔध (पवन दूत, आँख का आँसू) बाबू जयशंकर प्रसाद : कामायनी, भारती भण्डार, इलाहाबाद पाठ : चिन्ता सर्ग


    अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर :

    1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म कब हुआ था? [GU 2023]

    उत्तर: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 ईस्वी को काशी (वाराणसी) में हुआ था।

    2. मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित किसी एक खण्डकाव्य का नाम लिखिए। [GU 2023]

    उत्तर: 'पंचवटी' (अथवा 'जयद्रथ-वध') मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित प्रसिद्ध खण्डकाव्य है।

    3. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का देहावसान किस ईस्वी को हुआ था? [GU 2023]

    उत्तर: 'निराला' जी का देहावसान 15 अक्टूबर 1961 ईस्वी को इलाहाबाद (प्रयागराज) में हुआ था।

    4. 'कामायनी' का प्रकाशन वर्ष क्या है? [GU 2023]

    उत्तर: जयशंकर प्रसाद कृत महाकाव्य 'कामायनी' का प्रकाशन वर्ष 1935 ईस्वी (संवत 1992) है।

    5. 'बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ' शीर्षक कविता महादेवी वर्मा के किस काव्य-ग्रंथ में संगृहीत है? [GU 2023]

    उत्तर: यह कविता महादेवी वर्मा के प्रसिद्ध काव्य-संग्रह 'नीरजा' (1935 ई.) में संगृहीत है।

    6. जयशंकर प्रसाद का जन्म किस घराने में हुआ था? [GU 2023]

    उत्तर: जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के सुप्रसिद्ध 'सुंघनी साहु' (वैश्य) घराने में हुआ था।

    7. 'पल्लव' किसकी रचना है? [GU 2023]

    उत्तर: 'पल्लव' छायावादी सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त की प्रसिद्ध काव्य-कृति है।

    8. 'आधुनिक युग की मीरा' किन्हें कहा जाता है? [GU 2023]

    उत्तर: महादेवी वर्मा को उनकी विरह-प्रधान एवं रहस्यानुभूतिमूलक कविता के कारण 'आधुनिक युग की मीरा' कहा जाता है।

    9. सरोज कौन थी? [GU 2023]

    उत्तर: सरोज छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की दिवंगत सुपुत्री थी।

    10. 'परिवर्तन' कविता का रचना-काल क्या है? [GU 2023]

    उत्तर: सुमित्रानन्दन पन्त कृत 'परिवर्तन' कविता का रचना-काल सन् 1924 ईस्वी है (यह 'पल्लव' में संकलित है)।

    11. अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' द्वारा रचित 'प्रियप्रवास' को किस कोटि का काव्य माना जाता है?

    उत्तर: 'प्रियप्रवास' खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम मौलिक एवं प्रामाणिक महाकाव्य माना जाता है।

    12. 'कामायनी' महाकाव्य के प्रथम सर्ग का नाम क्या है?

    उत्तर: 'कामायनी' महाकाव्य के प्रथम सर्ग का नाम 'चिन्ता सर्ग' है।

    13. 'कामायनी' का मुख्य पात्र मनु किसका प्रतीक है?

    उत्तर: 'कामायनी' में मनु प्रतीकात्मक रूप से मानव के 'मन' (विचार एवं संकल्प-विकल्प) का प्रतिनिधित्व करते हैं।

    14. 'पवन दूत' प्रसंग 'हरिऔध' के किस महाकाव्य का प्रमुख अंश है?

    उत्तर: 'पवन दूत' प्रसंग 'हरिऔध' जी के महाकाव्य 'प्रियप्रवास' का एक प्रमुख अंश है।

    15. 'आँख का आँसू' कविता के रचयिता कौन हैं?

    उत्तर: 'आँख का आँसू' कविता के रचयिता अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' हैं।

    लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर (प्रत्येक 2 अंक ) :

    1. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के काव्य की दो भाषिक विशेषताएँ लिखिए। [GU 2023]

    उत्तर: भारतेन्दु युगीन काव्य-भाषा दोहरी प्रकृति वाली है:

    • ब्रजभाषा का परिष्कार: उन्होंने पद्य के लिए रीतिकालीन रूढ़ियों से मुक्त, सहज, प्रवाहपूर्ण और लोक-मुहावरों से युक्त सरस ब्रजभाषा का प्रयोग किया।

    • खड़ी बोली का आरंभ: गद्य में मानक खड़ी बोली को स्थापित करने के साथ-साथ उन्होंने देश-प्रेम की कतिपय कविताओं में खड़ी बोली पद्य का सफल प्रयोग किया।

    2. "सखि, वे मुझसे कहकर जाते।" यहाँ यशोधरा का कौन-सा मनोभाव व्यक्त हुआ है? [GU 2023]

    उत्तर: इस पंक्ति में यशोधरा का गहरा स्वाभिमान, आंतरिक आहत भाव और क्षोभ व्यक्त हुआ है। वह पति के सिद्धि-पथ पर जाने का विरोध नहीं करती, किंतु बिना बताए चुपके से चले जाने को क्षत्राणी धर्म और स्त्री के आन्तरिक आत्मसम्मान पर अविश्वास मानती है।

    3. यशोधरा की व्यथा लोक-व्यथा क्यों बन गई है? [GU 2023]

    उत्तर: यशोधरा की व्यथा केवल एक राजवधू की व्यक्तिगत विरह-वेदना नहीं है, बल्कि वह सम्पूर्ण भारतीय उपेक्षित नारी-जाति की मूक पीड़ा, त्याग और मातृत्व के दायित्व-बोध का सजीव प्रतीक बन जाती है। उसका आत्म-बलिदान और लोकोन्मुखी दृष्टिकोण ही उसकी व्यक्तिगत व्यथा को सार्वभौमिक लोक-व्यथा का स्वरूप प्रदान करता है।

    4. पन्त के अनुसार गंगा के जल में झलकता हुआ चन्द्रमा का बिम्ब कैसा प्रतीत हो रहा है? [GU 2023]

    उत्तर: 'नौका विहार' में पन्त जी ने चित्रित किया है कि चंचल लहरों के हिलोरों के बीच चमकता हुआ चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब ऐसा प्रतीत होता है मानो जल-रूपी रेशमी नीले अंचल में कोई सुंदर, नवजात शिशु या मुग्धा नायिका करवटें बदल-बदलकर अठखेलियाँ कर रही हो।

    5. महादेवी वर्मा का जन्म कब और कहाँ हुआ था? [GU 2023]

    उत्तर: महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च सन् 1907 ईस्वी (होली के पावन पर्व पर) उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद नगर में एक सुशिक्षित एवं प्रतिष्ठित कायस्थ परिवार में हुआ था।

    6. 'कामायनी' के 'चिन्ता सर्ग' का मुख्य प्रतिपाद्य क्या है?

    उत्तर: 'चिन्ता सर्ग' जल-प्लावन के बाद देव-संस्कृति के सर्वनाश और एकमात्र जीवित बचे पुरुष मनु की असीम मानसिक विकलता, शून्यताबोध और अस्तित्व-सम्बन्धी गहरी चिन्ता का दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक निरूपण करता है।

    7. हरिऔध कृत 'पवन दूत' में राधा का चरित्र पारंपरिक गोपियों से किस प्रकार भिन्न है?

    उत्तर: 'पवन दूत' की राधा केवल व्यक्तिगत वियोग में तड़पने वाली विरहिणी नहीं है, बल्कि वह विश्व-वेदना से द्रवित लोक-सेविका हैं। वह पवन को दूत बनाकर भेजते हुए मार्ग में पीड़ित कृषक ललनाओं और थके-मांदे पथिकों के दुःख दूर करने की प्रेरणा देती हैं।

    8. 'आँख का आँसू' कविता में हरिऔध जी ने क्या संदेश दिया है?

    उत्तर: इस कविता में कवि ने स्पष्ट किया है कि अहंकार और तुच्छता का त्याग करके ही व्यक्ति महान बनता है। परोपकार, संवेदनशीलता और दूसरों के दुःख में विगलित होकर बहने वाला आँसू ही मनुष्यता का वास्तविक आभूषण है।

    9. निराला ने 'सरोज-स्मृति' को 'हिन्दी का प्रथम शोकगीत' क्यों बना दिया?

    उत्तर: 'सरोज-स्मृति' में निराला ने अपनी मृत पुत्री सरोज के प्रति व्यक्तिगत करुण विलाप के साथ-साथ एक विद्रोही जनकवि के रूप में अपने सम्पूर्ण जीवन के कटु सामाजिक संघर्षों, अभावों और संत्रास को अनूठे मार्मिक शिल्प में बाँधा है।

    10. छायावाद की प्रमुख दो प्रवृत्तियाँ संक्षेप में बताइए।

    उत्तर:

    • आत्मानुभूति और वैयक्तिकता: छायावादी कवियों ने बाह्य स्थूल वर्णनों के स्थान पर अपने निजी सुख-दुःख और अन्तर्मुखी अनुभूतियों को प्रमुखता से अभिव्यक्त किया।

    • प्रकृति का मानवीकरण: प्रकृति को मात्र उद्दीपन न मानकर एक चेतन, सप्राण नारी अथवा आलम्बन रूप में चित्रित किया।

    11. मैथिलीशरण गुप्त को 'राष्ट्रकवि' क्यों कहा जाता है?

    उत्तर: गुप्त जी ने 'भारत-भारती' जैसी युगांतरकारी रचनाओं के माध्यम से पराधीन भारत को उसके गौरवशाली अतीत का स्मरण कराया, वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ व्यक्त किया और स्वाधीनता आन्दोलन हेतु जन-जन में राष्ट्र-प्रेम की प्रखर चेतना फूँकी।

    12. जयशंकर प्रसाद के अनुसार 'चिन्ता' क्या है?

    उत्तर: प्रसाद जी के अनुसार 'चिन्ता' मन के अभाव, असुरक्षा और मानसिक द्वन्द्व की पहली वक्र रेखा है। यह सम्पूर्ण विश्व-वन को डसने वाली सर्पिणी के समान है, जो मनुष्य के आत्म-विश्वास और समरसता को विनष्ट कर देती है।

    13. 'बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ' में व्यक्त अद्वैत भाव क्या है?

    उत्तर: महादेवी वर्मा यहाँ अपने आराध्य परमात्मा और अपनी आत्मा के बीच पूर्ण एकात्मता दर्शाती हैं। वे एक ही समय में वाद्ययंत्र (साधन) और उससे निःसृत मधुर संगीत (साध्य), दोनों बनकर अपने अस्तित्व को परम-चेतना में विलीन करती हैं।

    14. 'परिवर्तन' कविता में पन्त जी ने काल (समय) का क्या रूप प्रस्तुत किया है?

    उत्तर: पन्त जी ने काल को एक अत्यंत निष्ठुर, सर्वशक्तिमान और निरंतर गतिमान चक्र के रूप में चित्रित किया है, जिसके एक ही संकेत पर सृष्टि का वैभव, यौवन और ऐश्वर्य क्षण-क्षण में खंडहरों में परिवर्तित हो जाता है।

    15. भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के 'निज भाषा उन्नति' का केंद्रीय संदेश क्या है?

    उत्तर: इसका केंद्रीय संदेश यह है कि मातृभाषा की उन्नति ही देश की सर्वांगीण उन्नति की मूल धुरी है। निज भाषा के ज्ञान के बिना हृदय की वास्तविक व्यथा और अज्ञानता का निवारण किसी भी स्थिति में संभव नहीं है।

    खंड ‘ग’ : दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर (प्रत्येक 5 अंक | शब्द सीमा: ~200 शब्द)

    1. 'निज भाषा उन्नति' शीर्षक कविता की मूल संवेदना पर विचार कीजिए। [GU 2023]

    उत्तर:

    भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कृत 'निज भाषा उन्नति' भारतेन्दु युग और आधुनिक हिन्दी नवजागरण का घोषणा-पत्र मानी जाती है। इस कविता की मूल संवेदना राष्ट्र की अस्मिता, सामाजिक चेतना और भाषाई स्वावलंबन से जुड़ी हुई है।

    भारतेन्दु जी का दृढ़ विश्वास था कि किसी भी राष्ट्र, समाज या व्यक्ति का सर्वांगीण विकास उसकी अपनी मातृभाषा के विकास के बिना असंभव है। जब तक समाज अपनी भाषा में ज्ञान-विज्ञान और विचारों का आदान-प्रदान नहीं करेगा, तब तक वास्तविक चेतना का प्रसार नहीं हो सकता:

    "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

    बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥"

    कवि ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि विदेशी भाषा में उच्च शिक्षा ग्रहण करने पर भी हृदय की भावनाएँ और मौलिक विचार केवल निज भाषा में ही प्रस्फुटित होते हैं। वे तत्कालीन शिक्षित वर्ग को चेतावनी देते हैं कि अंग्रेजी के ज्ञान-प्रसार के साथ-साथ अपनी राष्ट्रभाषा और लोकभाषा को कभी विस्मृत न करें। कवि घर, परिवार, व्यापार और राजकाज—सभी क्षेत्रों में निज भाषा के प्रयोग की वकालत करते हैं। यह कविता भाषाई दासता से मुक्ति की प्रेरणा देती हुई देशवासियों में एकता, स्वाभिमान और सामाजिक जागरण का स्थायी संदेश प्रसारित करती है।

    2. निराला कृत 'सरोज-स्मृति' की केन्द्रीय संवेदना पर विचार कीजिए। [GU 2023]

    उत्तर: महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित 'सरोज-स्मृति' हिन्दी साहित्य का अद्वितीय और सर्वाधिक मार्मिक करुण-शोकगीत (Elegy) है। इसकी केन्द्रीय संवेदना केवल पुत्री-वियोग का व्यक्तिगत रुदन नहीं, बल्कि एक स्वाभिमानी, विद्रोही जनकवि के जीवन-संघर्ष और सामाजिक यथार्थ का क्रूर आख्यान है।

    कवि अपनी अठारह वर्षीया पुत्री सरोज के असमय निधन पर गहन शोक से भर उठता है। वह सरोज के बाल्यकाल, उसके अद्वितीय सादगीपूर्ण विवाह और अंततः मातृहीन अवस्था में बीमारी के कारण असामयिक देहावसान का चित्रण करता है। निराला यहाँ अपने भीतर के पिता और कवि के अंतर्द्वंद्व को उकेरते हैं। वे स्वयं को असहाय और असमर्थ पाते हैं:

    "दुख ही जीवन की कथा रही,

    क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!"

    इस कविता में पुत्री के प्रति वात्सल्य के समानांतर तत्कालीन संवेदनहीन समाज, साहित्यिक विरोधियों के षड्यंत्रों और आर्थिक विपन्नता के प्रति प्रखर आक्रोश भी मुखरित हुआ है। अंत में, कवि अपने जीवन भर के संचित समस्त सत्कर्मों और साहित्यिक पुण्यों को अपनी दिवंगत पुत्री के तर्पण हेतु समर्पित कर देता है। इस प्रकार, यह रचना व्यक्तिगत शोक को उदात्त सामाजिक करुणा में रूपांतरित कर देती है।

    3. 'कामायनी' के 'चिन्ता सर्ग' के आधार पर मनु की मनोदशा का वर्णन कीजिए।

    उत्तर: जयशंकर प्रसाद कृत 'कामायनी' का प्रथम सर्ग 'चिन्ता सर्ग' जल-प्रलय की विनाशलीला के उपरांत एकाकी बचे आदिपुरुष मनु के अन्तर्मन के गहन द्वन्द्व, संशय और भय का मनोवैज्ञानिक उद्घाटन करता है।

    प्रलयकारी बाढ़ के शांत होने पर हिमालय की उत्तुंग चोटी पर शिला की शीतल छाँह में बैठे मनु चारों ओर फैले जल-विस्तार को देखते हैं। देव-संस्कृति का विलासितापूर्ण वैभव, उन्मत्त आनंद और अहंकार समूल नष्ट हो चुका था। मनु इस महाविनाश के एकमात्र साक्षी बनकर 'चिन्ता' के भयानक रूप का साक्षात्कार करते हैं। वे चिन्ता को 'विश्व-वन की सर्पिणी' और 'अभाव की चपल बालिका' कहकर संबोधित करते हैं।

    मनु के मन में अतीत की विलासिता की स्मृतियाँ और भविष्य की अनिश्चितता का भय एक साथ टकराते हैं। वे अस्तित्व के निरर्थकताबोध और असीम अकेलेपन से ग्रस्त हैं। वे सोचते हैं कि जिस अमरता का दंभ देवगण भरते थे, वह प्रकृति के एक ही थपेड़े में छिन्न-भिन्न हो गई। इस प्रकार, 'चिन्ता सर्ग' में प्रसाद जी ने मनु के माध्यम से केवल एक पौराणिक चरित्र की व्यथा नहीं, अपितु आधुनिक संत्रस्त मानव के आंतरिक शून्य, अस्तित्ववादी भय और चिन्तनशील मन की व्याकुलता का कालजयी चित्र खींचा है।

    4. 'हरिऔध' के काव्य में अभिव्यक्त 'पवन दूत' प्रसंग के आधार पर राधा के लोकोपकारी स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' के महाकाव्य 'प्रियप्रवास' में समाविष्ट 'पवन दूत' प्रसंग परम्परागत दूत-काव्यों की तुलना में अत्यंत युगांतरकारी और मौलिक है। यहाँ राधा केवल अपने व्यक्तिगत वियोग में तड़पने वाली रीतिकाल की विरहिणी नायिका नहीं हैं, बल्कि वे एक आदर्श, परोपकारी और लोकोन्मुखी नारी के रूप में सामने आती हैं।

    राधा जब एकांत में श्रीकृष्ण के विरह से व्याकुल होकर बहने वाली सुगंधित वायु को अपना 'दूत' बनाकर मथुरा भेजती हैं, तो उनका निर्देश आश्चर्यजनक रूप से जनकल्याण की भावना से ओतप्रोत होता है। वे पवन को समझाती हैं कि मथुरा जाते समय मार्ग में यदि कोई थका-हारा कृषक, परिश्रमी स्त्री या अभावग्रस्त व्यक्ति दिखे, तो वह अपनी मंद-शीतल बयार से उसकी थकान मिटाए:

    "कोई क्लांता कृषक-ललना खेत में जो दिखावे,

    धीरे-धीरे परस उसकी क्लान्तियों को मिटाना।"

    राधा अपने प्रिय कृष्ण के वियोग के निजी दुःख को समूचे समाज की वेदना में विलीन कर देती हैं। उनका विरह संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर 'विश्व-प्रेम' और 'मानव-कल्याण' में परिणत हो जाता है। हरिऔध जी ने राधा के इस नवीन स्वरूप के द्वारा आधुनिक युग की कर्तव्यनिष्ठ, त्यागमयी और समाज-सेविका भारतीय नारी की गरिमा को प्रतिष्ठित किया है।

    5. 'नौका विहार' कविता में सुमित्रानन्दन पन्त के प्रकृति-चित्रण एवं दार्शनिक चिंतन का मूल्यांकन कीजिए। [GU 2023]

    उत्तर: सुमित्रानन्दन पन्त कृत 'नौका विहार' छायावादी प्रकृति-काव्य की एक उत्कृष्ट एवं प्रतिनिधि रचना है। इसमें कवि ने शांत, चांदनी रात में गंगा नदी पर की गई नौका-यात्रा का अत्यंत नयनाभिराम, सजीव और दार्शनिक चित्रण प्रस्तुत किया है।

    कविता के पूर्वार्ध में पन्त जी का सुकुमार सौंदर्य-बोध मुखरित होता है। वे ग्रीष्मकालीन मंद-प्रवाहिता गंगा का मानवीकरण करते हुए उसे 'तपस्वी बाला' और 'दुग्ध-धवल शय्या पर लेटी तन्वंगी गंगा' के रूप में चित्रित करते हैं। जल में परावर्तित चांदनी रात, तारों के झिलमिलाते बिम्ब और लहरों के आरोह-अवरोह का दृश्य पाठक के समक्ष एक अत्यंत अलौकिक, जादुई वातावरण निर्मित करता है।

    उत्तरार्ध में कवि का सौंदर्य-बोध अचानक गहन दार्शनिक चिंतन में रूपांतरित हो जाता है। बीच धारा में पहुँचकर जब कवि गंगा की शाश्वत गति को देखते हैं, तो उन्हें जीवन और जगत् की नश्वरता के भीतर छिपे सनातन सत्य का बोध होता है:

    "जग-जीवन का कर्णधार!

    चिर जन्म-मरण के आर-पार,

    शाश्वत जीवन-नौका-विहार!"

    कवि अनुभव करते हैं कि जिस प्रकार धारा का जल निरंतर बहता रहता है किंतु उसका अस्तित्व सदा बना रहता है, उसी प्रकार मानव-जीवन में जन्म और मृत्यु का चक्र निरंतर चलता रहता है। यह कविता प्रकृति के बाह्य सौंदर्य से आरंभ होकर जीवन के आध्यात्मिक रहस्य पर विराम लेती है।

    6. 'यशोधरा' के आधार पर मैथिलीशरण गुप्त की नारी-भावना पर प्रकाश डालिए। [GU 2023]

    उत्तर: मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक हिन्दी साहित्य के उन विरले कवियों में हैं, जिन्होंने इतिहास और पुराणों में उपेक्षित रही नारी-पात्रों (यथा उर्मिला, यशोधरा, कैकेयी) की अंतर्वेदना को वाणी देकर उन्हें गरिमामय धरातल पर प्रतिष्ठित किया। काव्य-कृति 'यशोधरा' इसका ज्वलंत प्रमाण है।

    सिद्धार्थ जब सिद्धि प्राप्ति हेतु यशोधरा और अपने अबोध पुत्र राहुल को सोता हुआ छोड़कर रात्रि के अंधकार में चले जाते हैं, तो यशोधरा का स्वाभिमान अत्यंत आहत होता है। वह अपने पति के महान लक्ष्य का विरोध नहीं करती, बल्कि चुपके से चले जाने की प्रवृत्ति पर तीखा आक्षेप करती है:

    "सिद्धि हेतु स्वामी गए, यह गौरव की बात,

    पर चोरी-चोरी गए, यही बड़ा व्याघात।

    सखि, वे मुझसे कहकर जाते!"

    गुप्त जी ने यशोधरा को केवल विलाप करने वाली अबला के रूप में नहीं, बल्कि अद्वितीय क्षत्राणी तेज, कर्तव्यनिष्ठा और स्वावलंबन की प्रतिमूर्ति के रूप में गढ़ा है। वह अपने पुत्र का पालन-पोषण मर्यादा और साहस के साथ करती है। जब बुद्ध सिद्धि प्राप्त कर लौटते हैं, तो यशोधरा उनके स्वागत हेतु स्वयं नहीं जाती, बल्कि बुद्ध को भिक्षुक बनकर उसके द्वार पर आना पड़ता है। गुप्त जी ने यशोधरा के माध्यम से नारी के आत्मसम्मान, त्याग, मातृत्व और नैतिक विजय की अमर गाथा लिखी है।

    7. महादेवी वर्मा के विरह-काव्य और रहस्यवादी चेतना की प्रमुख विशेषताओं का उद्घाटन कीजिए। [GU 2023]

    उत्तर: छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में महादेवी वर्मा का स्थान अपनी अनूठी रहस्यानुभूति और सघन विरह-वेदना के कारण अत्यंत विशिष्ट है। इसी कारण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और परवर्ती आलोचकों ने उन्हें 'आधुनिक युग की मीरा' की संज्ञा दी है।

    महादेवी जी के काव्य की विरह-वेदना सांसारिक या स्थूल न होकर एक अज्ञात, असीम और पारलौकिक प्रियतम (ईश्वर/परम-चेतना) के प्रति समर्पित है। उनके विरह में नैराश्य या पराजय का भाव नहीं, अपितु एक अलौकिक आनंद और साधना की परिपक्वता है। वे स्पष्ट कहती हैं:

    "मिलन का मत नाम ले, मैं विरह में चिर हूँ!"

    उनकी रहस्यवादी चेतना में जिज्ञासा, विस्मय, समर्पण और अद्वैत-मिलन की उत्कंठा के विविध चरण दिखाई देते हैं। 'बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ' जैसी कविताओं में आत्मा और परमात्मा का द्वैत मिटकर पूर्ण तादात्म्य स्थापित हो जाता है। उनके काव्य में दीपक और बादल जैसे प्रतीकों का अत्यंत सार्थक प्रयोग हुआ है। दीपक उनकी अविरल साधना, निष्ठा और आत्म-समर्पण का प्रतीक है, तो बादल उनकी करुणा और विरह के अश्रुओं का। उनकी भाषा नाद-सौंदर्य, कोमलकांत पदावली और तत्समयुक्त संगीतात्मकता से परिपूर्ण है, जो उनकी विरह-चेतना को रहस्यमयी ऊँचाइयों तक पहुँचाती है।

    8. व्याख्या कीजिए: [GU 2023]

    "ओ! चिन्ता की पहली रेखा ! अरी विश्व वन की व्याली।

    ज्वालामुखी स्फोट के भीषण प्रथम कम्प सी मतवाली ॥

    हे अभाव की चपल बालिके ! री ललाट की खल लेखा।

    हरी-भरी सी दौड़ धूप, ओ जल-माया की चल-रेखा ॥"

    उत्तर: प्रसंग: प्रस्तुत पद्य-पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित युगांतकारी महाकाव्य 'कामायनी' के प्रथम सर्ग 'चिन्ता सर्ग' से अवतरित हैं। जल-प्लावन के बाद देव-संस्कृति के विनाश को देखकर हिमालय पर बैठे मनु के मन में जब सर्वप्रथम 'चिन्ता' का उदय होता है, तब वे चिन्ता के संहारक और चंचल रूप को संबोधित करते हैं।

    व्याख्या: कवि मनु के माध्यम से कहते हैं कि हे चिन्ता की पहली रेखा! तुम इस संसार रूपी हरे-भरे वन को डसने वाली अत्यंत विषैली सर्पिणी (व्याली) के समान हो। जिस प्रकार किसी ज्वालामुखी के फटने से पूर्व धरती के भीतर एक भीषण, कंपकंपी पैदा करने वाला कंपन उत्पन्न होता है, उसी प्रकार तुम भी मनुष्य के शांत हृदय में विनाशकारी उथल-पुथल मचा देने वाले प्रथम प्रकम्पन के समान उन्मत्त हो।

    हे चिन्ता! तुम मनुष्य के मन में किसी वस्तु के न होने (अभाव) से जन्म लेने वाली अत्यंत चंचल और अनियंत्रित बालिका हो। तुम मनुष्य के भाग्य-पटल (ललाट) पर खिंच जाने वाली वह कुटिल रेखा हो जो उसका सुख-चैन छीन लेती है। तुम संसार रूपी मरुस्थल में मृगमरीचिका (जल-माया) की भांति चंचल और भ्रामक हो, जिसके पीछे मनुष्य व्यर्थ ही निरंतर दौड़ता रहता है।

    विशेष: रूपक और उपमा अलंकार का अत्यंत सशक्त प्रयोग; तत्सम प्रधान परिष्कृत खड़ी बोली; चिन्ता का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक मानवीकरण।

    9. व्याख्या कीजिए: [GU 2023]

    "नींद थी मेरी अचल निस्पंद कण-कण में,

    प्रथम जागृति थी जगत् के प्रथम स्पंदन में;

    प्रलय में मेरा पता पदचिह्न जीवन में,

    शाप हूँ जो बन गया वरदान बंधन में;

    कूल भी हूँ कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ!"

    उत्तर: प्रसंग: प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध रहस्यवादी कविता 'बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ' (संग्रह: 'नीरजा') से उद्धृत हैं। यहाँ कवयित्री अपनी आत्मा और समष्टि-चेतना (परमात्मा) के बीच परस्पर अद्वैत और सर्वव्यापक संबंध का प्रतिपादन कर रही हैं।

    व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि जब यह संपूर्ण सृष्टि सुषुप्तावस्था में थी, तब कण-कण में निश्चल और स्पंदनहीन नींद के रूप में मैं ही विद्यमान थी। और जब इस संसार में जीवन का प्रथम स्पंदन (हलचल) हुआ, तो उस पहली जागृति के रूप में भी मेरा ही अस्तित्व था।

    सृष्टि के महाप्रलय और संहार में जहाँ मेरा ही अस्तित्व विलीन रहता है, वहीं जीवन के हर नए आरंभ और गतिशीलता में मेरे ही पदचिह्न अंकित हैं। मैं वह लौकिक शाप हूँ, जो प्रेम और समर्पण के आध्यात्मिक बंधन में बंधकर एक अलौकिक वरदान में रूपांतरित हो गई हूँ। मैं मर्यादाओं से बँधा हुआ नदी का 'तट' (कूल) भी हूँ और सीमाओं को तोड़कर बहने वाली 'असीम, तटहीन जलधारा' (प्रवाहिनी) भी हूँ।

    विशेष: विरोधाभास और अद्वैतवादी रहस्यवाद का सुंदर समन्वय; कोमलकांत पदावली एवं अंतर्निहित गेयता।

    10. भारतेन्दु युगीन काव्य-प्रवृत्तियों और आधुनिक हिन्दी नवजागरण के अंतर्संबंधों को स्पष्ट कीजिए।

    उत्तर: भारतेन्दु युग (1857-1900 ई.) हिन्दी साहित्य में मध्यकालीन सामंती रूढ़ियों से मुक्त होकर आधुनिक चेतना और 'नवजागरण' के संक्रांति-काल का प्रतिनिधित्व करता है। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और उनका मंडल हिन्दी नवजागरण की अग्रिम पंक्ति के संवाहक थे।

    इस युग की कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ सीधे तौर पर राष्ट्रीय नवजागरण से जुड़ी थीं:

    • देशभक्ति और राजभक्ति का द्वन्द्व: एक ओर कवियों ने ब्रिटिश शासन की शांति-व्यवस्था की औपचारिक प्रशंसा (राजभक्ति) की, तो दूसरी ओर अंग्रेजों द्वारा भारत के आर्थिक शोषण और धन-निष्कासन की तीव्र आलोचना करते हुए प्रखर 'देशभक्ति' का शंखनाद किया (यथा: "अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी, पै धन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी" )।

    • सामाजिक सुधार एवं जन-जागरण: कवियों ने बाल-विवाह, छुआछूत, धार्मिक पाखंड और विधवा-उत्पीड़न जैसी सामाजिक कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य किए और स्त्री-शिक्षा तथा समाज-सुधार का समर्थन किया।

    • भाषा-प्रेम और जनोन्मुखता: 'निज भाषा उन्नति' के माध्यम से मातृभाषा के विकास को राष्ट्रीय स्वाभिमान की पहली शर्त घोषित किया गया।

    • शिल्पगत समन्वय: पद्य में परंपरागत ब्रजभाषा और लोक-शैलियों (कजली, होरी, लावणी) का प्रयोग करते हुए तत्कालीन समकालीन जन-समस्याओं को वाणी दी गई।

    इस प्रकार, भारतेन्दु युग की कविता ने भक्ति और रीतिकाल की विलासिता से साहित्य को निकालकर जनता के वास्तविक सुख-दुःख, स्वाधीनता की आकांक्षा और सामाजिक जागरण के पथ पर दृढ़ता से अग्रसर किया।

























































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